गाँधी का वध ना होता तो सरदार पटेल मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देते

जब मोहन दास करमचंद गाँधी का वध हुआ, तब सरदार बल्लभ भाई पटेल भारत के उप प्रधान मंत्री थे पाकिस्तान और हिन्दुस्थान के विवादस्पद मुद्दों पर 15 अगस्त से लगातार उच्च स्तर पर वार्तालाप चल रहा था। पाकिस्तान को पचपन करोड़ रूपये की मांग का विषय भी उसमें सम्मिलित था।

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पाकिस्तान ने कश्मीर पर कबाईलियों के वेश में आक्रमण कर दिया और पचपन करोड़ की वसूली के लिए नेहरू पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। हमारी भारतीय सेना ने पाकिस्तान के इस आक्रमण को विफल बनाने और उन्हें कश्मीर से खदेड़ने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी। सरदार पटेल जी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि ऐसे समय में पाकिस्तान को यदि पचपन करोड़ रूपये मिल जाए तो वह उसी धनराशी को भारत के साथ युद्ध में लगा देगा।

जहाँ भारतीय सेना के जवान अपना रक्त बहा रहे है वहीँ भारत सरकार गलती से कोई ऐसा कदम उठा दे तो भारत की शर्मनाम हार ही नहीं होगी अपितु खंडित भारत का एक ओर हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में आ जाएगा। ऐसे विकट संकट की स्थिति में भारत सरकार के एक जिम्मेदार शासक होने के नाते दिनांक 12- 01- 1948 को सरदार पटेल ने पत्रकार वार्ता में यह बयान दिया-

“We were therefore fully justified in providing against aggressive actions in regard to Kashmir by postponing the implementation of the agreement. We have made it clear to the Pakistan Government more than once that we stand by the agreement which we reached. The agreement does not bind the Government of India to any fixed date for payment and we cannot reasonably be asked to make a payment of cash balances to Pakistan when an armed conflict with its forces is in progress and threatens to assume even a more dangerous character, which would be likely to destroy the whole basis of the financial agreement and would endanger other parts of the agreement, such as agreements for taking over of debt, division of stores, etc.” Indian Information dated -2-2-1948,

“काश्मीर पर आक्रमण के प्रतिरोध की प्रतिक्रिया के रूप में इस संधि की ( आर्थिक संधि की ) कार्यवाही को अभी स्थगित करके हमने न्यायोचित कार्य किया है। हम इस संधि के प्रति निष्टावान हैं, वचनबद्ध है, यह हमने पाकिस्तान को एक बार नहीं, अनेक बार कहा है किन्तु इस संधि में रुपया देने की निश्चित अवधि जैसा कोई बंधन हमारे ऊपर नहीं है। पाकिस्तान ने अपनी सेना की सहायता से हमसे सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है और ओसके और अधिक विस्तार की भयानक संभावना है ऐसे आस्था में संधि का दुरूपयोग संभव है। ऋण के उत्तदायित्व को स्वीकार करना और सम्पति का बंटवारा करना जैसे संधि में समाविष्ट अनुबंधों पर भी उसका विपरीत परिणाम होगा। उस दशा में पाकितान किसी भी प्रकार से संधि की शेष राशि प्राप्त करने के लिए अपनी मांग न्याय संगत रूप से प्रस्तुत नहीं कर सकेगा ” इंडियन इनफार्मेशन 2-2-1948

इसके आगे सरदार पटेल जी भारत सरकार की ओर से पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए साफ कहा – काश्मीर के प्रश्न का निर्णय हुए बिना हम कोई भी रुपया देना स्वीकार नहीं करेंगे, ऐसा मैंने उस समय स्पष्ट किया था। भारत सरकार का यह निर्णय गांधी को रास नहीं आया, उन्होंने नेहरु पर दबाव बनाया पर पटेल के डर से निर्णय नहीं बदला। गांधी फिर अपनी बात मनवाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए। भारत सरकार को गांधी की जान बचाने के लिए अपना निर्णय बदलने पर मजबूर होना पड़ा और पाकिस्तान को पचपन करोड़ रूपये देने के लिए बाध्य होना पड़ा। देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ और सेना का मनोबल तोड़ने वाला यह निर्णय बहुत ही शर्मनाक था जिससे प० नाथूराम गोडसे की भावना को आघात लगा।

उसी दिन रात्रि को प० गोडसे नाना आप्टे से मिले और रात भर  देश को गाँधी से मुक्त करने की योजना पर मंथन हुआ, जिसके परिणाम में तीस जनवरी को गांधी वध हुआ।

गांधी का राजनीतिक हस्तक्षेप से देश को बहुत नुक्सान हो चूका था, पहले गांधी ने कहा कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा फिर कांग्रेस की महासमिति की बैठक में घुस कर भारत के विभाजन के लिए प्रस्ताव पारित करवा कर गांधी पहले ही राष्ट्रद्रोह का अपराध कर चुके थे, उस पर पाकिस्तान को आक्रमण के समय आर्थिक सहायता पहुंचाने के लिए भारत को विवश करना, इस तरह गांधी की दादागिरी पर कोई लगाम नहीं लग पा रही थी। सरदार पटेल बहुत ही चिंतित और लाचार अनुभव कर रहे थे, गांधी की कुटिल नीतियाँ देश की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा बन रही थी यह सोच कर पटेल जी ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने का मन बना लिया था। गाँधी वध से जुड़े कपूर आयोग की रिपोर्ट में इस बात के प्रमाण मिलते है की सरदार पटेल के कामकाज में गांधी का हस्तक्षेप बढता जा रहा था। रिपोर्ट के अनुसार  सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन पटेल की गवाही 25 जनवरी को  हुई। जिसमें उन्होंने कपूर आयोग को बताया  कि सरदार पटेल ने श्री मथाई चेट्टी , प० नेहरु और गाँधी से पाकिस्तान को पचपन करोड़ रूपये देने के मुद्दे पर बैठक की। गांधी का व्यवहार ठीक नहीं था, जिससे सरदार पटेल को बहुत दुःख हुआ। फिर पटेल जी के मुख से ऐसे शब्द निकले कि “अब मैं इस सरकार  में नहीं रह सकता”।

15 अगस्त ४७ के बंटवारे के बाद भी गांधी के मुस्लिम व पाकिस्तान के प्रति नरम रवैया स्वयं कांग्रेसी नेताओं के गले की हड्डी बनता जा रहा था। सरदार पटेल जी के अथक प्रयास से पांच सौ से अधिक देशी रजवाड़े शेष भारत के साथ विलय संधि कर चुके थे, परन्तु हैदराबाद के मुस्लिम शासक निजाम पर विलय की कार्यवाही में गाँधी ने पटेल की चलने नहीं दी, उस पर पाकिस्तान का कश्मीर पर आक्रमण से एक और मुस्लिम राज्य का बनना भारत की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा था। पटेल जी गांधी की हठ के आगे स्वयं को बंधा महसूस करने लगे, इसलिए दुखी होकर यह शब्द कि- “अब मैं इस सरकार मैं नहीं रह सकता” निकले और उनकी पुत्री मणिबेन ने सुन लिया।

प० नाथूराम गोडसे ने गांधी का वध कर हैदराबाद की मुक्ति के लिए भी रास्ता साफ़ कर दिया। गाँधी वध के साथ गांधी की अहिंसा भी विदा हो गई और  17  अगस्त  1948 सैनिक कार्यवाही करके सरदार पटेल ने हैदराबाद को मुक्त किया और भारत का अभिन्न हिस्सा बना दिया। गांधी देश की एकता में बहुत बड़ा रोड़ा बन चुके- सरदार पटेल की इस बाधा को गोडसे ने अपने बलिदान से दूर कर दिया।

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