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गांधी वध पर गोडसे के न्यायालय में दिये गये बयान के अंश – भाग 2

बंबई के साप्ताहिक नेशनल गार्डियन ने अपने 17 जनवरी, 1947 के अंष से – ‘‘नेहरू शासन में हिंदुस्तान की घोर वंचना।‘‘ पाकिस्तान जो धौंस से पा न सका वह गांधीजी के हठ आग्रह से पा गया। ‘शीर्षक के नीचे दिया था – ‘‘अपने राष्ट्रीय जनों से जिससे नरसंहार होगा वह पैसे देने का कृत्य हम नहीं करेंगे। ऐसी गर्जना चल रही थी और सरदार वल्लभ भाई की धौंस और दबाव में भीख नहीं डालेंगे। ऐसे वीरत्व के शब्द सुनने में आते थे। इतने पर भी गांधी ने अनशन करके पाकिस्तान को करोड़ों रूपये देने को नेहरू शासन को बाध्य कर दिया।

February 1948: The niece of Mahatma Gandhi (Mohandas Karamchand Gandhi) places flower petals on his brow as he lies in state at Birla House, New Delhi, after his assassination. Immediately after this picture was taken the procession left for the burning ghat on the banks of the river Jumna, where the cremation took place. (Photo by Keystone/Getty Images)

55 करोड़ रूपये प्रदान की स्वीकृति से लोग कैसे क्षुब्ध थे, इसका यह उदाहरण है। मुसलमानों ने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया, इसलिये पाकिस्तान बना। जिन्होंने पाकिस्तान का पक्ष लिया उनको पांचवें स्तंभी कहा गया है। उनकी निंदा की गई परंतु मेरी दृश्टि में गांधीजी ने पाकिस्तान का पक्ष सबसे अधिक लिया और कोई शक्ति उनको रोक नहीं सकी।

इस स्थिति में हिंदुओं को मुसलमानों के अत्याचारों से बचाने का एक ही उपाय था कि गांधी का अंत कर दिया जाए। गांधीजी राष्ट्रपिता के नाम से पुकारे जाते हैं। जो अत्यंत सम्मान का पद है। पर वे पिता का कर्तव्य पालन करने में असमर्थ रहे। उन्होंने तो बड़ी निर्दयता से राश्ट्र के दो टुकड़े कर दिये। यदि वे सच्ची आत्मा से पाकिस्तान का विरोध करते तो मुस्लिम लीग कभी भी इतनी दृढ़ता से यह मांग न रख पाती और अंग्रेज पूर्ण प्रयत्न करके भी इसे न बना पाते। देष की जनता पाकिस्तान बनाने की घोर विरोधी थी। पर गांधीजी ने जनता को धोखा दिया। इसलिये मैंने भारतमाता का एक पुत्र होने के नाते अपना कर्तव्य समझा कि ऐसे व्यक्ति अंत कर दिया जाय जिसको कहा तो जा रहा है राश्ट्रपिता, किंतु जिसने मातृभूमि का विभाजन करने में सर्वाधिक हाथ बंटाया।

हैदराबाद की समस्या का भी यही इतिहास है। निजाम के मंत्रियों एवं रजाकारों ने जो अत्याचार हिंदुओं ने किये उनका वर्णन करने की आवष्यता नहीं है। वहां के प्रधानमंत्री लायक अली जनवरी 1948 के अंतिम सप्ताह में गांधीजी से मिले थे। षीघ्र ही पता चल गया कि गांधीजी का व्यवहार इस विशय में भी विचित्र है। जिस प्रकार उन्होंने सुहरावर्दी को अपनाया था, उसी प्रकार कासिम रिजवी को भी दत्तक पुत्र समझकर व्यवहार व्यवहार करेंगे, यह बिल्कुल स्पश्ट था। जब तक गांधीजी जीवित थे, तब तक सरकार हैदराबाद के विरूद्ध कुछ न कर सकी, यद्यपि यह पूर्ण अधिकार और षक्ति संपन्न थी। यदि गांधीजी के जीवन में ही भारत सरकार हैदराबाद में सेना या पुलिस की कोई कार्रवाही करने का निष्चय करती तो गांधीजी हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर सरकार को अपने निष्चय बदलने पर बाध्य कर देते। जिस प्रकार उन्होंने 55 करोड़ रूपया पाकिस्तान को न देने का निर्णय वापिस लेने के लिये सरकार को बाध्य कर दिया था।

जब गांधीजी अनषन करने की ठान लेते तो उनका जीवन बचाने के लिये सरकार को उनकी इच्छानुसार चलना पड़ता। गांधीजी के अंिहंसा सिद्धांत के अनुसार हमें अत्याचार सहन करते जाना चाहिये और षस्त्र या षारीरिक षक्ति से प्रतिकार नहीं करना चाहिये।गांधीजी की अहिंसा उस सिंह की अहिंसा है, जो उस समय अहिंसा का पुजारी हो जाता है जब वह सहस्त्रों गायों को खा पीकर थक जाता है।
कानपुर में गणेष षंकर विद्यार्थी को मुसलमानों ने निर्दयता से मार दिया था। गांधीजी उनका उदाहरण देकर कहते थे कि इस प्रकार अहिंसा पर चलकर अपना बलिदार कर देना चाहिये। मेरा विष्वास है कि यह अहिंसा (नपुंसकत्व) देष को नश्ट कर देगी और पाकिस्तान भारत पर आधिपतय जमा लेगा।

मुझे स्पश्ट दिखाई देता था कि यदि मैं गांधीजी का वध करूंगा तो मैं जड़ मूल से नश्ट कर दिया जाउंगा। लोग मुझसे घृणा करेंगे, मेरा सम्मान जो मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है, नश्ट हो जायेगा किंतु साथ में मैं यह भी जानता था कि गांधीजी सदा के लिये विदा हो जायेंगे तो देष की राजनीति में षस्त्र प्रयोग प्रतिकारात्मक कार्रवाही को स्थान मिलेगा। देष षक्तिषाली होगा। मैं अवष्य ूमरूंगा, किंतु देष अत्याचारों से मुक्त होगा। सब मुझे मूर्ख कहेंगे, पर देष ऐसे मार्ग पर चलेगा जो उचित होगा। यही सोचकर मैंने गांधीजी का अंत करने की ठानी।

मैंने अपना निर्णय किसी को नहीं बताया। 30 जवरी 1948 के दिन मैंने गांधीजी का वध किया। अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि जो वक्तव्य मैंने दिया है वह सत्य और षुद्ध है। प्रत्येक बात संदर्भ ग्रंथों को देखकर तैयार की गई है। मैंने सरकारी समाचार-पत्र, इंडियन इयर बुक, कांग्रेस का इतिहास, गांधीजी की आत्मकथा समय≤ पर प्रकाषित कांग्रेस के बुलेटिन, यंग इंडिया और हरिजन की फाईलें और गांधीजी की प्रार्थना-सभा के भाशणों से यह वक्तव्य तैयार करने में सहायता ली है।मैंने यह लंबा वक्तव्य इसलिये नहीं दिया है कि लोग मेरे कार्य को सराहें, बल्कि इसलिये दिया है कि लोग मेरे विचारों को भली-भांति जान जायें और किसी के मस्तिश्क में मेरे विशय में कोई भ्रांत धारणा न रहे।

भगवान करे हमारा देश फिर अखंड हो और जनता उन विचारों का त्याग करे जो अत्याचारी के आगे झुकने की प्रेरणा देते हैं। भगवान से यही मेरी अंतिम प्रार्थना है।

मेरी वक्तव्य अब समाप्त हो चुका है। आप ने इसे ध्यान से सुना और सुविधायें दी उसके लिये मैं कृतज्ञ हूं। जिन्होंने इस बड़े अभियोग में मुझे कानूनी सहायता दी और जो पुलिस आफिसर इस अभियोग से संबंधित हैं उनके प्रति मेरे हृदय में कोई दुर्भावना नहीं है। मैं उनके सद्व्यवहार के लिये, उनका भी कृतज्ञ हूं, जेल के आफिसरों को भी धन्यवाद, उन्होंने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया है।

यह सत्य है कि मैंने तीन-चार सौ लोगों के बीच दिन के समय गांधी पर गोलियां चलाई। मैंने भागने का कोई प्रयत्न नहीं किया। वास्तव में भागने का विचार मेरे मस्तिश्क में आया ही नहीं। मैंने अपने उपर गोली चलाने का प्रयत्न भी नहीं किया। आत्मघात करने का मेरा कभी विचार न था। क्योंकि मैं अपने विचारों को खुले न्यायालय में प्रकट करना चाहता था। आलोचनाओं के बावजूद भी मैंने कृत्य किया उसके नैतिक पक्ष पर मेरी आत्मा कभी विचलित नहीं हुई। मुझे यह किंचित भी संदेह नहीं कि भविश्य में सच्चाई और ईमानदारी से इतिहास के इस अध्याय को इतिहासकार लिखेंगे तो वे मेरे कार्यों और उसके परिणाम का सही मूल्यांकन करेंगे।

पाठक स्वयं विष्लेशण कर सकते हैं कि क्या गोडसे का कार्य-हिंदू राश्ट्र, हिंदू समाज के विघटन और अपमान करने वाले उत्तरदायी व्यक्ति को दंड देना नहीं था ? क्या वह पागल हत्यारा था ? जैसा प्रचारित किया गया। क्या वह राश्ट्रद्रोही था ? नहीं-नहीं, कदापि नहीं!!! जब देष का सच्चा इतिहास लिखा जायेगा, स्वतंत्र भारत के इस अंतिम शहीद से न्याय अवश्य होगा।

दिव्य संदेश

वास्तव में मेरे जीवन का उसी समय अंत हो गया था, जब मैंने गांधी पर गोली चलाई थी। उसके पष्चात् मानो मैं समाधि में हंू और अनाषक्त जीवन बिता रहा हूं। मैं जानता हूं कि गांधीजी ने देष के लिये बहुत कश्ट उठाये, जिसके कारण मैं उनकी सेवा के प्रति एवं उनके प्रति नतमस्तक हूं। किंतु देष के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि के विभाजन का अधिकार नहीं था। मैं किसी प्रकार की दया नहीं चाहता हूं। मैं यह भी नहीं चाहता हूं कि मेरी ओर से कोई दया की याचना करे। ‘‘अपने देष के प्रति भक्ति भाव रखना यदि पाप है तो मैं स्वीकार करता हूं कि वह पाप मैंने किया है।यदि वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य पद पर मेरा नम्र अधिकार है।‘‘ मेरा विष्वास अडिग है कि मेरा कार्य नीति में दृश्टि से पूर्णतया उचित है। मुझे इस बात में लेषमात्र भी संदेह नहीं कि भविश्य में किसी समय सच्चे इतिहासकार लिखेंगे तो वे मेरे कार्य को उचित ठहरायेंगे।
-नाथूराम गोडसे

नाथूराम गोडसे का बयान न्यायालय कक्ष में उपस्थि लोगों के लिये आकर्शण की वस्तु था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावुक हो जाता था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनाई देती थी। दर्षकों की आंखें गीली हो जाती थी, आंसू गिरते दिखाई देते थे। यदि दर्षकों को न्याय करने का कार्य सौंप दिया जाता तो यह निष्चित था कि वह पं. नाथूराम गोडसे को निर्दोश करार देते। –जस्टिस जी.डी. खोसला

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