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गांधी वध पर न्यायालय में दिये गये बयान के अंश

मैंने गांधी जी को राजनैतिक क्षेत्र से सदा के लिये हटाने का निश्चय किया। मैं जानता था कि वैयक्तिक स्तर पर मेरा सब कुछ नष्ट हो जायेगा। मैं धनी नहीं, मध्य वर्ग का हूं। मैं अपने प्रांत में सार्वजनिक कार्य करता था। मैंने लोगों की जोे सेेवा की उसके कारण मुझे अपने प्रांत में आदर और सम्मान मिला। सभ्यता और संस्कृति के संस्कारों से मैं पूरा परिचित था। मैं जो योजनाऐं बनाता उसे पूरा करने की पंक्ति मुझमें थी। मेरा शरीर  सबल है। न कोई अंग विकार है, न ही मुझे कोई व्यसन है। यद्यपि मैं विद्धान नहीं हूं परंतु विद्वानों के लिये मेरे हृदय में आदर है।

February 1948: The niece of Mahatma Gandhi (Mohandas Karamchand Gandhi) places flower petals on his brow as he lies in state at Birla House, New Delhi, after his assassination. Immediately after this picture was taken the procession left for the burning ghat on the banks of the river Jumna, where the cremation took place. (Photo by Keystone/Getty Images)

(Photo by Keystone/Getty Images)

सन् 1921-30 में कांग्रेस ने जब सहयोग आंदोलन षुरू किया तब मैंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। मैं तब विद्याार्थी था। इस आंदोलन संबंधित भाषण जो समाचार-पत्रों में छपे, मैंने पढ़े और मैं प्रभावित हुआ। मैंने आंदोलन में भाग लेने का विचार किया। कुछ समय बाद आंदोलन असफल हो गया तो मुसलमानों से संबंधित समस्याऐं बहुत जोर पकड़ गई।

फलस्वरूप हिंदू महासभा के नेता डॅा0 मुंजे, भाई परमानंद और मालवीय जी आदि हिंदू समाज के नेता हिंदुओं के संगठन में लग गये। सन् 1825 के लगभग स्वर्गीय डॅा0 हेडगेवार ने राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव डाली। उनके भाषणों का मुझ पर प्रभाव पड़ा। मैं स्वयंसेवक बना। मै महाराष्ट्र के उन युवकों में था, जिन्होंने संघ में उसके प्रारंभ से भाग लिया। कुछ वर्शों तक मैंने संघ में काम किया। कुछ दिन पष्चात् मैंने सोचा कि वैधानिक रूप से हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा के लिये राजनीति में भाग लेना चाहिये। जिस कारण मैं संघ को छोड़कर हिंदू महासभा में आ गया।

सन् 1935 में महासभा ने हैदराबाद में आंदोलन किसा तो मैं पहला जत्था लेकर आया। मुझे एक वर्श का कारावास मिला। मुझे हैदराबाद निजाम की बर्बरता और दानवता का व्यक्तिगत अनुभव है। वंदेमातरम् गाने पर वहां मुझे कई बार बेंते तक लगाई गयी थी।

सन् 1943 में बिहार सरकार ने आदेष दिया कि भागलपुर में हिंदू महासभा का अधिवेषन न हो। हिंदू महासभा ने उसका उल्लंघन करने का निष्चय किया, क्योंकि सरकार की यह आज्ञा अनुचित थी। सरकार के सब प्रतिरोंधों के बावजूद अधिवेषन हुआ। अधिवेषन की तैयारी करने के लिये मैं लगभब एक मास तक राश्ट्रविरोधी तुश्टीकरण के विरोध में भूमिगत होकर काम करता रहा। मैंने समाचार-पत्रों में अपने कार्य की प्रषंसा पढ़ी और देखा कि जनता ने उस समय मेरे सार्वजनिक कार्य को सराहा।

मेरी प्रकृति में हिंसा नहीं थी।बडगे ने जो कहा कि मैंने श्री भोपटकर को मारने को चाकू निकाला था, झूठ है। श्री भोपटकर हमारे पक्ष के वकील हैं। यदि मैं उन पर चाकु निकालता तो क्या वे हमारी सहायता कर सकते थे? यदि वह घटना सही होती तो मैं श्री भोपटकर की सहायता लेता भी नहीं। मेरे व्यक्तित्व से परिचित हैं, वे मेरी षांत प्रकृति को जानते हैं, किंतु उच्च नेताओं ने गांधीजी की सहमति से मातृभूमि के टुकड़े कर डाले तब मेरा हृदय क्षोभ से भर गया।

मैं स्पश्ट करना चाहता हूं कि मैं कांग्रेस का षत्रु नहीं। मैं इस संस्था को सबसे अधिक महत्व देता रहा, क्योंकि उसने देष की आजादी के लिये काम किया था। मेरा नेताओं से मतभेद था तथा अब तक है। यह मेरे 28 फरवरी 1935 के सावरकर के नाम पत्र से भली-भांति विदित होता है। आज भी मेरे वही विचार हैं।

गांधीजी से मेरी षत्रुता नहीं थी। लोग कहते हैं कि पाकिस्तान योजना में उनका मन षुद्ध था। मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरे मन में देष प्रेम के अतिरिक्त कुछ न था। मुझे इस कारण हाथ उठाना पड़ा कि पाकिस्तान बनने पर जो भयंकर घटनायें हुई उनके उत्तरदायी केवल गांधीजी थे।
मुझे यह पता था कि हत्या के बाद लोगों के विचार मेरे विशय में बदल जायेंगे। समाज में जितना मेरा आदर है, वह नश्ट हो जायेगा। मैं जानता था कि समाचार-पत्र बुरी तरह मेरी निंदा करेंगे, किंतु मैं यह नहीं जानता था कि अखबार इतने पतित हो जायेंगे कि सत्य का गला घोंट देंगे। समाचार-पत्रों ने कभी निश्पक्षता से नहीं लिखा। यदि वे (गांधीजी) देष के हित का अधिक ध्यान रखते और एक मनुश्य की व्यक्तिगत इच्छाओं को कम ध्यान देते तो देष के नेता पाकिस्तान न स्वीकार न करते।

समाचार-पत्रों की यह नीति थी कि लीडरों की गलतियों को प्रकट न होने दिया जाय। देष का विभाजन इससे सरल हो गया। ऐसे भ्रश्ट समाचार-पत्रों के डर से मैंने अपने निष्चय की दृढ़ता को विचलित नहीं होने दिया। कुछ लोग कहते हैं कि यदि पाकिस्तान न बनता तो आजादी न मिलती। मैं इस विचार को ठीक नहीं मानता। लीडरों ने अपने पाप को छिपाने के लिये यह बहाना बनाया है। गांधीवादी कहते हैं कि उन्होंने अपनी पंक्ति से स्वराज्य पाया। यदि उन्होंने अपनी षक्ति से स्वराज्य लिया है तो ‘‘उन्होंने हारे हुए अंग्रेजों को पाकिस्तान की षर्त क्यों रखने दी और पंक्ति से क्यों न रोका?‘‘

मेरे विचार से महात्मा और उनके अनुयायियों की एक ही ‘पालिसी‘ रही, और वह यह कि पहले यवनों की मांगों पर विरोध दर्शाना, फिर हिचक दिखाना और अंत में आत्म-समर्पण कर देना। इसी प्रकार पाकिस्तान की रूपरेखा स्वीकार कर ली गई। जून 1947 को माउंटबैटन के साथ बैठकों में छलपूर्वक पाकिस्तान स्वीकार कर लिया गया। पंजाब, बंगाल, सीमाप्रांत और सिंध के हिंदुओं का कोई विचार नहीं किया गया। देष के टुकड़े करके एक मजहबी धर्म-निश्ठित मुस्लिम राज्य बना दिया गया। मुसलमानों को अपने अराश्ट्रीय कार्यों का फल (पुरस्कार) पाकिस्तान के रूप में मिल गया।

इसके विपरीत गांधीवादी नेताओं ने उन लोगों को देशद्रोही, सांप्रदायिक कहकर पुकारा जिन्होंने पाकिस्तान का विरोध किया था। (जबकि पाकिस्तान ने स्वयं स्वीकार करके जिन्नाह की सब बात ली थी)। इस दुर्घटना से मेरे मन की शान्ति भंग हो गयी। पाकिस्तान बनाने के बाद कांग्रेस सरकार पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा करती तो शायद मेरा क्रोध शांत हो जाता। मैं यह नहीं देख सका कि जनता को धोखा दिया जाये।

करोड़ों हिंदुओं को मुसलमानों की दया पर छोड़कर गांधीवादी कहते रहे कि हिंदुओं को पाकिस्तान से नहीं आना चाहिये और वहीं रहना चाहिये। इस प्रकार हिंदू मुसलमानों के चुंगल में फंस गये और विकट विपत्तियों के शिकार हुए। मुझे उन घटनाओं की यााद आती है तो मैं कांप उठता हूं।

प्रतिदिन सहस्त्रों हिंदुओं का संहार होता था। पंद्रह हजार सिखों को गोलियों से भून दिया गया। हिंदू स्त्रियों को नग्न करके जुलूस निकाले गये। उनको पषुओं की भांति बेचा गया। लाखों हिंदुओं को धर्म बचाकर भागना पड़ा। चालीस मील लंबा हिंदू-निराश्रितों का जत्था हिंदुस्तान की ओर आ रहा था। हिंदुस्तानी षासन इस भयानक कृत्य का कैसा भयानक निवारण करता था? – ‘‘उन निराश्रितों को वायुयान से रोटियां फेंककर?‘‘
भारत सरकार पाकिस्तान से अत्याचार रोकने के लिये अनुरोध करतीया धमकी देती कि यदि पाकिस्तान में अत्याचार बंद नहीं हुआ तो भारत में भी मुसलमानों की बुरी दषा होगी तो इतने अत्याचार न होते।

भारत सरकार गांधीजी के इषारों पर चलती थी परंतु उसकी नीति कुछ और ही थी। यदि पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा के लिये यदि समाचार पत्र कुछ लिख देते थे यह अर्थ लिया जाता था कि वे हिंदू मुसलमानों में मतभेद फैलाने का प्रयत्न कर रहे हैं। ऐसे कार्यों को अपराध माना जाने लगा और प्रेस इमरजेंसी एक्ट की धारायें लागू करके एक के बाद दूसरी जमानत मांगी जाने लगी। मुझे भी अनके नोटिस मिले और 16,000 रूपये की सुरक्षित निधि तक मांगी गयी। श्री मोरारजी देसाई के न्यायालय बयान के अनुसार ऐसी 900 घटनाऐं हुई। इतना ही नहीं, जब प्रेस प्रतिनिधि मंडल मोरार जी से मिलने गया तो उन्होंने उनकी एक न सुनी।

इस प्रकार मुझे आषा न रही कि गांधीवादी कांग्रेस सरकार पर षांतिमय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुसलमानों से संबंध रखने वाले रखने वाली समस्याओं में गांधीजी ने कभी जनता के विचारों पर ध्यान नहीं दिया। गांधीजी की अहिंसा की आड़ में इतना रक्तपात हो चुहा था कि जनता पाकिस्तान के पक्ष के किसी भी विचार का स्वागत करने के लिये तैयार न थी।स्पश्ट था कि जब तक पाकिस्तान में धर्मांध मुस्लिम राज्य है तब तक भारत में षांति नहीं हो सकती। फिर भी गांधीजी इस प्रकार का प्रचार कर रहे थे और इस तरह के विचार पाकिस्तान के पक्ष में फैला रहे थे जैसा कर पाने में कोई कट्अर लीगी नेता भी सफल न हो पाता। इन्हीं दिनों आमरण अनषन की घोशणा करते हुए जो षर्तें थी वह भी केवल हिंदुओं के विरूद्ध और मुसलमानों के पक्ष में थी । गांधीजी के अनषन की जो षर्तें थीं उनमें पहली यह थी कि दिल्ली की खाली पड़ी मस्जिदों में रह रहे हिंदू षरणार्थियों को बाहर निकाला जाये और मस्जिदें मुसलमानों को सौंप दी जाये। गांधीजी ने अपनी षर्त सरकार और अन्य नेताओं को अनषन की धमकी देकर स्वीकार कराई। कजस दिन यह घटना हुई उस दिन मैं दिल्ली में था। मैंने देख कि किस प्रकार गांधीजी की जिद को पूरा किया गया। वे षीत के दिन थे। गांधीजी ने अनषन खोला उस दिन वर्शा हो रही थी। ऐसी असाधारण सर्दी और वर्शा में अच्छे स्थानों पर रहने वाले लोग भी कांप रहे थे। उस समय निराश्रित षरणार्थियों के कुटुंब के कुटुंब मस्जिदों से सर्दी के मारे कांपते हुए निकल गये उनकी रक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया गया। कुछ षरणार्थियों जो कुटंुब और स्त्रियों सहित बिरला हाउस गये और उन्होंने नारे लगाये-‘‘गांधीजी हमें स्थान दो।‘‘ उस भव्य भवन में रहने वाले गांधी तक उन निराश्रितों की आवाज नहीं पहुंच सकी। मैंने यह दृष्य अपनी आंखों से देखा जिसे देखकर कठोर से कठोर व्यक्ति का हृदय भी पिघल जाता।

मेंरे मस्तिश्क में इससे अनेक विचार आने लगे। मैंने सोचा कि क्या षरणार्थियों ने प्रसन्नता से इन मस्जिदों में डेरे डाले हैं? नहीं-नहीं ! गांधी को भी उन स्थितियों का पुरा पता था, जिनसे बाध्य होकर उन्हें अपने घर छोड़कर इन मस्जिदों की षरण लेनी पड़ीं। पाकिस्तान में एक भी मंदिर या गुरूद्वारा सुरक्षित नहीं रहा। षरणार्थियों ने अपनी आंखों से देखा था कि किस प्रकार मुसलमानों ने हिंदू मंदिरों और गुरूद्वारों को अपवित्र किया। जो हिंदू षरणार्थी दिल्ली षरण लेने के लिये आये थे उन्हें यहां कोई स्थान नहीं मिला। इसमें आष्चर्य की क्या बात है यदि उन लोगों ने पेड़ों के नीचे और गली-कूूचों में न पड़े रह कर, पंजाब में बीती हुई दुर्घटनाओं को स्मरण करके, दिल्ली की व्यर्थ खाली पड़ी मस्जिदों में षरण ली। मेरे विचार मंे इस प्रकार मस्जिदें मानवता की भलाई के लिये काम आ रही थी। गांधीजी ने यह निष्चय किया कि मंस्जिदों को खाली कराया जाये, परंतु उन षरणार्थियों के रहने का दूसरा प्रबंध क्यों नहीं कराया ? उन्होंने पाकिस्तान के मंदिर हिंदुओं को सौंपने की मांग क्यों नहीं की ? जिससे पता चलमा है कि गांधी वास्तव में अहिंसा के पुजारी हैं, हिंदू मुस्लिम एकता के इच्छुक हैं और उनमें निश्पक्ष आत्मषक्ति है।

गांधी ने पूरी चालाकी की और अपने अनषन को खोलने के लिये पाकिस्तान के लिये एक शर्त भी न रखी। यदि वे रखते तो संसार देखता कि गांधीजी बनषन करते हुए स्वर्ग सिधार जातें और पाकिस्तान के एक भी मुसलमान को लेषमात्र दुःख न होता। उन्होंने अपने अनुभव से देख लिया था कि व्रत का जिन्नाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और मुस्लिम लीग उनकी आत्मषक्ति की परवाह नहीं करती।

अंत में यह कहना अनुचित न हो कि गांधी के फूल (अस्थि) भारत और विदेषों की बहुत सी नदियों में बहाये गये परंतु यह अस्थि पाकिस्तान की सिंधु नदी में नहीं बहायी जा सकी। इस संबंध में पाकिस्तान में भारत के राजदूत श्रीयुत श्रीप्रकाष जी का प्रयत्न निश्फल रहा।
अब 55 करोड़ रूपयों की बात लीजिये। उप-प्रधानमंत्री का निवेदन देखिये। गांधीजी ने स्वयं कहा है कि किसी सरकार से उसका निर्णय बदलवाना कठिन होता है। लेकिन भारत सरकार नें गांधीजी के अनषन के कारण पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये न देने का अपना निर्णय बदल दिया।

सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये न देने का निर्णय जनता के प्रतिनिधि होने के नाते किया था, लेकिन गांधीजी के अनषन ने इस निर्णय को बदल दिया। तब मुझे यह ज्ञात हुआ कि गांधीजी की पाकिस्तान परस्ती के आगे जनता के मत का कोई महत्व नहीं है। (अपने प्रतिवृत्त के पहले खंड के पृश्ठ 143 पर न्या. कपूर ने उस समय वृत्त-पत्रों में छपी प्रक्रिया का एक उदाहरण दिया है। अनुच्छेद 12/ए-45 जो इस प्रकार है)

क्रमश:

 

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