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श्री नाथूराम गोडसे का अंतिम पत्र अपने माता-पिता के नाम

अंबाला, सेंट्रल जेल – दिनांक 12.11.1949

परम वंदनीय माताजी और पिताजी – अत्यंत विनम्रता पूर्वक अंतिम प्रणाम ।आपका आशीर्वादात्मक तार प्राप्त हुआ। आपने अपने स्वास्थ्य और वृद्धावस्था को ध्यान में रखते हुए, यहां तक न आने की मेरी विनती को स्वीकार कर लिया, इससे मुझे बहुत संतोष हुआ।आपके छायाचित्र मेरे पास हैं, उनका पूजन करके ही मैं ब्रह्म मे लीन हो जाउंगा।

व्यवहारिक और लौकिक दृष्टि से देखा जाये तो आपको इस घटना से बहुत दुख होगा, इसमें संदेह नहीं, परंतु यह पत्र मैं किसी प्रकार के दुःखावेग अथवा दुःख की चर्चा के लिये नहीं लिख रहा हूं। आप गीता के नियमित पाठक हैं। पुराणों का अध्ययन भी आपने किया हुआ है। जिस कृष्ण ने गीता ज्ञान की गंगा प्रवाहित की उन्हीं श्रीकृष्ण भगवान ने राजसूय यज्ञभूमि पर शिशुपाल जैसे राजा का अपने सुदर्शन चक्र से वध किया है (रणभूमि पर नहीं), किंतु क्या कोई कह सकता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध कर कोई पाप किया ? केवल शिशुपाल का ही नहीं अपितु अनेक असंहारी असुरों का भी वध उन्होंने विश्व कल्याण की भावना से किया और फिर गीता उपदेश द्वारा उन्हीं श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने बंधु-बांधवों से लड़ने के लिये गांडीव धनुष उठाने का आह्वान किया।

पाप और पुण्य मनुष्य के काम में नहीं, उसकी मनोभावना में विद्यमान रहते हैं। दुष्टों को दान देना पुण्य नहीं समझा जाता, ‘उसे अधर्म माना गया है।‘ केवल एक सीता माता के कारण रामायण की कथा बन गयी और एक द्रौपदी के कारण महाभारत का इतिहास बन गया। भारत में इस समय सहस्त्रावधि हिंदू महिलाओं का शीलहरण हो रहा था और शीलहर्ता पाकिस्तानी राक्षस यवनों के प्रति, हर प्रकार से सहायता के प्रयत्न हो रहे थे, इस स्थिति में अपने प्राणों के भय से अथवा जननिंदा के भय की शंका से डर कुछ भी न कर मूकदृष्टा बने रहना मुझे न भाया। मैं समझता हूं कि उन सहस्त्रों हिंदू महिलाओं के आशीर्वाद आज मुझे प्राप्त है।

मैं अपनी मातृभूमि के चरणों पर अपना बलिदान प्रस्तुत करता हूं। मेरे इस कार्य द्वारा, मेरे अपने और उसके साथ कुछ अन्य कुटुंबियों की दुर्दशा अवश्य हो गयी है, किंतु मेरी दृष्टि के सम्मुख छिन्न-विछिन्न मंदिर, छिन्न मस्तकों की श्रृंखला, हिंदू बालकों की निर्मम हत्या, रमणियों की विडंबना, प्रति क्षण विद्यमान रहते हैं। आततायी और अनाचारी दुष्ट यवनों को मिलने वाली सहायता समाप्त करना मैंने अपना कर्तव्य समझा था।

मेरा मन क्षुब्ध है मेरी आत्मा भी उसी प्रकार क्षुब्ध थी। कहने वाले भले ही कुछ कहते रहें, किंतु मैं समझता हूं कि एक क्षण के लिये भी मेरा मन विक्षुब्ध नहीं हुआ है। यदि संसार में कोई स्वर्ग नाम का स्थान है तो मेरा स्थान वहां सुरक्षित है, ऐसी मेरी धारणा है। उसके लिये मुझे किसी प्रकार की प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि कहीं मोक्ष है तो उसकी कामना मुझे है।

दया के नाम पर अपने जीवन की याचना करना मुझे तनिक भी रूचिकर नहीं। और भारत शासन को धन्यवाद देता हूं कि उसने स्वतः ही मुझ पर किसी प्रकार की दया क्षमा कर मेरे मृत्युदंड को नहीं घटाया। दया की भिक्षा के आधार पर जीवित रहने को मैं वास्तविक मृत्यु मानता हूं। मृत्युदंड देने वालों में मुझे मारने की शक्ति नहीं है।

मेरा बलिदान मेरी मातृभूमि प्रेम से स्वीकार करेगी। मुत्यु मेरे सामने नहीं आई अपितु मैं स्वयं ही मृत्यु के सम्मुख जाकर खड़ा हो गया हूं। मैं मृत्यु की ओर प्रसन्नवदन दृष्टिपात कर रहा हूं और वह भी एक मित्र की भांति मेरा आलिंगन करने के लिये आतुर है।

आपुले मरण पाहिले म्यां डोला।
तो जाहजा सोहळा अनुपम।।
जातस्य हि मृत्युः धु्रवोम जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येथे न त्वं शोचितुमर्हसि।।

गीता के श्लोक-श्लोक में जीवन और मृत्यु की समस्या का विवेचन भरा हुआ है। ज्ञानी मनुष्य को शोक विह्वल करने की शक्ति मृत्यु में नहीं है। ‘‘मेरे शरीर का तो नाश हो जायेगा, परंतु मैं विद्यमान रहूंगा। सिंधु नदी से कन्याकुमारी तक भारतवर्ष को पूर्णतया स्वतंत्र करने का मेरा ध्येय-स्वप्न मेरे शरीर की मृत्यु से मिटना संभव नहीं।‘‘

शासन ने आपको मुझसे मिलने की अंतिम स्वीकृति नहीं दी। शासन से किसी भी प्रकार की सद्भावना की अपेक्षा न रखते हुए भी यह कहना पड़ेगा कि अपना शासन किस प्रकार मानवता के तत्व को अपना रहा है।

(माता-पिताजी वृद्ध हैं, वे लोग पूना में रहते हैं। उनकी इतनी लंबी यात्रा कर मुझसे मिलने के लिये आना संभव नहीं है। अतः उनसे मिलने के लिये मुझे एक बार वहां ले जाया जाय जिससे की वे मुझसे मिल सकें और वहीं यरवदा (पूना) बंदीगृह में मुझे फांसी दे दी जाय, इस प्रकार की विनती नाथूराम ने शासन से की थी। उनको शासन ने स्वीकार नहीं किया। इसी का संकेत उन्होंने अपने पत्र में उपर लिखा है।)

मैं समझता हूं कि आपको इससे अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है। मेरे मित्रगण और चि. दत्ता, गोविंद, गोपाल आदि आपको कभी मेरा अभाव खटकने नहीं देंगे। मैं अप्पा सें पूरे विस्तार से बात करूंगा, वह आपके सब कुछ समझण् देगा। कभी मेरा अभाव खटकने नहीं देंगे।
इस देश में लाखों ऐसे मनुष्य होंगे जिनके नेत्रों से इस बलिदान से अश्रु प्रवाहित होंगे। वे लोग आपके दुःख में सहभागी हैं। इसमें संदेह नहीं कि आप भी स्वयं को इश्वर की निष्ठा के बल पर संभाले रहेंगे।

अखंड भारत अमर रहे वंदे मातरम्।
आपके चरणों में सहस्त्र प्रणाम।।
आपका
(नाथूराम गोडसे)

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गांधी वध पर गोडसे के न्यायालय में दिये गये बयान के अंश – भाग 2

बंबई के साप्ताहिक नेशनल गार्डियन ने अपने 17 जनवरी, 1947 के अंष से – ‘‘नेहरू शासन में हिंदुस्तान की घोर वंचना।‘‘ पाकिस्तान जो धौंस से पा न सका वह गांधीजी के हठ आग्रह से पा गया। ‘शीर्षक के नीचे दिया था – ‘‘अपने राष्ट्रीय जनों से जिससे नरसंहार होगा वह पैसे देने का कृत्य हम नहीं करेंगे। ऐसी गर्जना चल रही थी और सरदार वल्लभ भाई की धौंस और दबाव में भीख नहीं डालेंगे। ऐसे वीरत्व के शब्द सुनने में आते थे। इतने पर भी गांधी ने अनशन करके पाकिस्तान को करोड़ों रूपये देने को नेहरू शासन को बाध्य कर दिया।

February 1948: The niece of Mahatma Gandhi (Mohandas Karamchand Gandhi) places flower petals on his brow as he lies in state at Birla House, New Delhi, after his assassination. Immediately after this picture was taken the procession left for the burning ghat on the banks of the river Jumna, where the cremation took place. (Photo by Keystone/Getty Images)

55 करोड़ रूपये प्रदान की स्वीकृति से लोग कैसे क्षुब्ध थे, इसका यह उदाहरण है। मुसलमानों ने स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया, इसलिये पाकिस्तान बना। जिन्होंने पाकिस्तान का पक्ष लिया उनको पांचवें स्तंभी कहा गया है। उनकी निंदा की गई परंतु मेरी दृश्टि में गांधीजी ने पाकिस्तान का पक्ष सबसे अधिक लिया और कोई शक्ति उनको रोक नहीं सकी।

इस स्थिति में हिंदुओं को मुसलमानों के अत्याचारों से बचाने का एक ही उपाय था कि गांधी का अंत कर दिया जाए। गांधीजी राष्ट्रपिता के नाम से पुकारे जाते हैं। जो अत्यंत सम्मान का पद है। पर वे पिता का कर्तव्य पालन करने में असमर्थ रहे। उन्होंने तो बड़ी निर्दयता से राश्ट्र के दो टुकड़े कर दिये। यदि वे सच्ची आत्मा से पाकिस्तान का विरोध करते तो मुस्लिम लीग कभी भी इतनी दृढ़ता से यह मांग न रख पाती और अंग्रेज पूर्ण प्रयत्न करके भी इसे न बना पाते। देष की जनता पाकिस्तान बनाने की घोर विरोधी थी। पर गांधीजी ने जनता को धोखा दिया। इसलिये मैंने भारतमाता का एक पुत्र होने के नाते अपना कर्तव्य समझा कि ऐसे व्यक्ति अंत कर दिया जाय जिसको कहा तो जा रहा है राश्ट्रपिता, किंतु जिसने मातृभूमि का विभाजन करने में सर्वाधिक हाथ बंटाया।

हैदराबाद की समस्या का भी यही इतिहास है। निजाम के मंत्रियों एवं रजाकारों ने जो अत्याचार हिंदुओं ने किये उनका वर्णन करने की आवष्यता नहीं है। वहां के प्रधानमंत्री लायक अली जनवरी 1948 के अंतिम सप्ताह में गांधीजी से मिले थे। षीघ्र ही पता चल गया कि गांधीजी का व्यवहार इस विशय में भी विचित्र है। जिस प्रकार उन्होंने सुहरावर्दी को अपनाया था, उसी प्रकार कासिम रिजवी को भी दत्तक पुत्र समझकर व्यवहार व्यवहार करेंगे, यह बिल्कुल स्पश्ट था। जब तक गांधीजी जीवित थे, तब तक सरकार हैदराबाद के विरूद्ध कुछ न कर सकी, यद्यपि यह पूर्ण अधिकार और षक्ति संपन्न थी। यदि गांधीजी के जीवन में ही भारत सरकार हैदराबाद में सेना या पुलिस की कोई कार्रवाही करने का निष्चय करती तो गांधीजी हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर सरकार को अपने निष्चय बदलने पर बाध्य कर देते। जिस प्रकार उन्होंने 55 करोड़ रूपया पाकिस्तान को न देने का निर्णय वापिस लेने के लिये सरकार को बाध्य कर दिया था।

जब गांधीजी अनषन करने की ठान लेते तो उनका जीवन बचाने के लिये सरकार को उनकी इच्छानुसार चलना पड़ता। गांधीजी के अंिहंसा सिद्धांत के अनुसार हमें अत्याचार सहन करते जाना चाहिये और षस्त्र या षारीरिक षक्ति से प्रतिकार नहीं करना चाहिये।गांधीजी की अहिंसा उस सिंह की अहिंसा है, जो उस समय अहिंसा का पुजारी हो जाता है जब वह सहस्त्रों गायों को खा पीकर थक जाता है।
कानपुर में गणेष षंकर विद्यार्थी को मुसलमानों ने निर्दयता से मार दिया था। गांधीजी उनका उदाहरण देकर कहते थे कि इस प्रकार अहिंसा पर चलकर अपना बलिदार कर देना चाहिये। मेरा विष्वास है कि यह अहिंसा (नपुंसकत्व) देष को नश्ट कर देगी और पाकिस्तान भारत पर आधिपतय जमा लेगा।

मुझे स्पश्ट दिखाई देता था कि यदि मैं गांधीजी का वध करूंगा तो मैं जड़ मूल से नश्ट कर दिया जाउंगा। लोग मुझसे घृणा करेंगे, मेरा सम्मान जो मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है, नश्ट हो जायेगा किंतु साथ में मैं यह भी जानता था कि गांधीजी सदा के लिये विदा हो जायेंगे तो देष की राजनीति में षस्त्र प्रयोग प्रतिकारात्मक कार्रवाही को स्थान मिलेगा। देष षक्तिषाली होगा। मैं अवष्य ूमरूंगा, किंतु देष अत्याचारों से मुक्त होगा। सब मुझे मूर्ख कहेंगे, पर देष ऐसे मार्ग पर चलेगा जो उचित होगा। यही सोचकर मैंने गांधीजी का अंत करने की ठानी।

मैंने अपना निर्णय किसी को नहीं बताया। 30 जवरी 1948 के दिन मैंने गांधीजी का वध किया। अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि जो वक्तव्य मैंने दिया है वह सत्य और षुद्ध है। प्रत्येक बात संदर्भ ग्रंथों को देखकर तैयार की गई है। मैंने सरकारी समाचार-पत्र, इंडियन इयर बुक, कांग्रेस का इतिहास, गांधीजी की आत्मकथा समय≤ पर प्रकाषित कांग्रेस के बुलेटिन, यंग इंडिया और हरिजन की फाईलें और गांधीजी की प्रार्थना-सभा के भाशणों से यह वक्तव्य तैयार करने में सहायता ली है।मैंने यह लंबा वक्तव्य इसलिये नहीं दिया है कि लोग मेरे कार्य को सराहें, बल्कि इसलिये दिया है कि लोग मेरे विचारों को भली-भांति जान जायें और किसी के मस्तिश्क में मेरे विशय में कोई भ्रांत धारणा न रहे।

भगवान करे हमारा देश फिर अखंड हो और जनता उन विचारों का त्याग करे जो अत्याचारी के आगे झुकने की प्रेरणा देते हैं। भगवान से यही मेरी अंतिम प्रार्थना है।

मेरी वक्तव्य अब समाप्त हो चुका है। आप ने इसे ध्यान से सुना और सुविधायें दी उसके लिये मैं कृतज्ञ हूं। जिन्होंने इस बड़े अभियोग में मुझे कानूनी सहायता दी और जो पुलिस आफिसर इस अभियोग से संबंधित हैं उनके प्रति मेरे हृदय में कोई दुर्भावना नहीं है। मैं उनके सद्व्यवहार के लिये, उनका भी कृतज्ञ हूं, जेल के आफिसरों को भी धन्यवाद, उन्होंने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया है।

यह सत्य है कि मैंने तीन-चार सौ लोगों के बीच दिन के समय गांधी पर गोलियां चलाई। मैंने भागने का कोई प्रयत्न नहीं किया। वास्तव में भागने का विचार मेरे मस्तिश्क में आया ही नहीं। मैंने अपने उपर गोली चलाने का प्रयत्न भी नहीं किया। आत्मघात करने का मेरा कभी विचार न था। क्योंकि मैं अपने विचारों को खुले न्यायालय में प्रकट करना चाहता था। आलोचनाओं के बावजूद भी मैंने कृत्य किया उसके नैतिक पक्ष पर मेरी आत्मा कभी विचलित नहीं हुई। मुझे यह किंचित भी संदेह नहीं कि भविश्य में सच्चाई और ईमानदारी से इतिहास के इस अध्याय को इतिहासकार लिखेंगे तो वे मेरे कार्यों और उसके परिणाम का सही मूल्यांकन करेंगे।

पाठक स्वयं विष्लेशण कर सकते हैं कि क्या गोडसे का कार्य-हिंदू राश्ट्र, हिंदू समाज के विघटन और अपमान करने वाले उत्तरदायी व्यक्ति को दंड देना नहीं था ? क्या वह पागल हत्यारा था ? जैसा प्रचारित किया गया। क्या वह राश्ट्रद्रोही था ? नहीं-नहीं, कदापि नहीं!!! जब देष का सच्चा इतिहास लिखा जायेगा, स्वतंत्र भारत के इस अंतिम शहीद से न्याय अवश्य होगा।

दिव्य संदेश

वास्तव में मेरे जीवन का उसी समय अंत हो गया था, जब मैंने गांधी पर गोली चलाई थी। उसके पष्चात् मानो मैं समाधि में हंू और अनाषक्त जीवन बिता रहा हूं। मैं जानता हूं कि गांधीजी ने देष के लिये बहुत कश्ट उठाये, जिसके कारण मैं उनकी सेवा के प्रति एवं उनके प्रति नतमस्तक हूं। किंतु देष के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि के विभाजन का अधिकार नहीं था। मैं किसी प्रकार की दया नहीं चाहता हूं। मैं यह भी नहीं चाहता हूं कि मेरी ओर से कोई दया की याचना करे। ‘‘अपने देष के प्रति भक्ति भाव रखना यदि पाप है तो मैं स्वीकार करता हूं कि वह पाप मैंने किया है।यदि वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य पद पर मेरा नम्र अधिकार है।‘‘ मेरा विष्वास अडिग है कि मेरा कार्य नीति में दृश्टि से पूर्णतया उचित है। मुझे इस बात में लेषमात्र भी संदेह नहीं कि भविश्य में किसी समय सच्चे इतिहासकार लिखेंगे तो वे मेरे कार्य को उचित ठहरायेंगे।
-नाथूराम गोडसे

नाथूराम गोडसे का बयान न्यायालय कक्ष में उपस्थि लोगों के लिये आकर्शण की वस्तु था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावुक हो जाता था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनाई देती थी। दर्षकों की आंखें गीली हो जाती थी, आंसू गिरते दिखाई देते थे। यदि दर्षकों को न्याय करने का कार्य सौंप दिया जाता तो यह निष्चित था कि वह पं. नाथूराम गोडसे को निर्दोश करार देते। –जस्टिस जी.डी. खोसला

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नाथूराम गोडसे – स्वतंत्र भारत का पहला और अंतिम बलिदानी

अकारण या सकारण की गयी हिंसा को उस समय की परिस्थियों के अस्थायी भाव का दुष्परिणाम कहा जा सकता है। लेकिन गांधी हत्या विक्षिप्तता की स्थिति नहीं थी, अपितु दो विपरीत वैचारिकी और कार्यशैली के मध्य, संघर्ष का परिणाम थी।

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पं. नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की, इसका समर्थन हम नहीं कर रहे हैं। हिंसा कैसी भी हो, त्याज्य, और घृणित होती है, वह ईश्वर के प्रति अपराध है। गांधीजी के कार्यों और व्यक्तित्व को लेकर असहमति हो सकती है लेकिन उनके अर्थशास्त्र और ग्रामोत्थान दर्शन का हम आदर करते हैं क्योंकि वह वैदिक अर्थव्यवस्था का आधार है।

वर्तमान में देष को वही अर्थतंत्र चाहिये जहां प्रत्येक ग्राम स्वावलंबी और समृद्ध हो, पं. नाथूराम गोडसे ने भी गांधीजी के अर्थशास्त्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विरोध नहीं किया था। हिंसा के कारण वे थे जो भविश्य में गांधीजी द्वारा प्रतिपादित और प्रसारित नीतियों के कारण समाज के मार्ग में बाधक हो सकते थे।

हिंसात्मक समाज के प्रति कोमल भावना का समर्पण-अहिंसा के महान आदर्षों की श्रेणी में नहीं आता, यही दृश्टिकोण पं. नाथूराम गोडसे का भी था। व्यवहारिक और वैवारिक जीवन में गांधीजी और अहिंसा की जिस प्रकार व्याख्या करते थे, उस व्याख्या पर गोडसे को आपत्ति थी अन्यथा वैचारिक दृश्टि से गोडसे भी अहिंसावादी थे, ऐसा उनके पत्रों और विभिन्न वक्तव्यों से पता चलता है।

हमारे साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम केवल कृत्य को देखते हैं कृत्य करने वाले के भाव को नहीं देखते। यह ठीक है कि गोडसे द्वारा की गयी हिंसा गलत थी लेकिन देशभक्ति के महान भावों से अभिभूत होकर उसने ऐसा कार्य किया, जिसमें उनका जीवन भी दांव पर था, जो वंदनीय है।उस पर भी ध्यान देना आवष्यक है। यह न्याय संगत समाज कर्तव्य है।

पं. नाथूराम गोडसे ने न्यायालय में कहा था कि ‘‘यदि देषभक्ति पाप है तो मैं मानता हूं कि मैंने पाप किया है। मुझे विश्वास है कि मनुष्यों द्वारा न्यायालय के उपर कोई न्यायालय हो तो उसमें मेरे काम को अपराध नहीं समझा जायेगा।‘‘ पं. नाथूराम गोडसे यह जानते थे कि गांधी वध के पश्चात लोग उन्हें पागल या सिरफिरा जैसे विश्लेषणों से संबोधित करेंगे। इसीलिये उन्होंने न्यायालय में निवेदन किया कि लोग मुझे विक्षिप्त व्यक्ति की संज्ञा देंगे, कहीं न्यायालय मुझे विक्षिप्त या मानसिक विकृति का षिकार न माने ले, और मुझ पर अपनी दया लादने का प्रयास करे या बचाव पक्ष ही मुझे मनोविकार ग्रस्त घोषित कर दया की याचना करे। अतः मैं नहीं चाहता कि दया की ऐसी स्थिति किसी प्रकार भी उत्पन्न हो। (गांधी वध और मैं-गोपाल गोडसे पृ.-34)

श्री गोडसे ने स्वस्थ मन और मष्तिष्क से गांधीजी की हत्या की। हत्या के समय भी वे तनावग्रस्त नहीं थे। 30 जनवरी 1948 की सायं बिड़ला भवन में उन्होंने 5ः17 पर गोली मारी। उनको भागने का पर्याप्त अवसर था, लेकिन वे नहीं भागे। जब उनसे पूछा गया कि गांधी हत्या के बाद उसके पास काफी समय था भागने का तो फिर वे क्यों नहीं भागे ? इस पर पं. नाथूराम गोडसे का कहना था कि यदि मैं भाग जाता तो यह बताने वाला कौन होता कि हत्या क्यों की गयी है ? निष्चित तौर पर उन्होंने न्यायालय में दिये गये बयान के 150 बिंदुओं में गांधी हत्या की स्वीकृति की है। गांधी हत्या के जो कारण उन्होंने बताये हैं वे अत्यंत तार्किक और अकाट्य हैं। पूर वाद (मुकदमे) में भारत सरकार की ओर से उन आरोपों का स्पश्टीकरण नहीं दिया गया और आज तक पं. नाथूराम गोडसे द्वारा उठाये गये बिंदुओं पर किसी भी गांधीववदी ने नहीं कहा कि आरोप गलत है। असल में, पं. नाथूराम गोडसे का हिंसात्मक कृत्य एक संवेदनषील और विवष भारतीय की पीढ़ा है वह यह समझने लगे थे कि गांधीजी बार-बार अनषन करते हैं और अपनी उचित-अनंचित मांगों को मनवा लेते हैं। गोडसे इसे गांधीजी द्वारा अनषन तोड़ने के बदले फिरौती मानते थे।

पं. नाथूराम गोडसे : बहुमुखी प्रतिभा के धनी – पं. नाथूराम गोडसे का जन्म 19 मई 1910 में महाराश्ट्र के चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। चितपावन ब्राह्मण समाज वही होता है जिसे पष्चिमी उत्तर प्रदेष और हरियाण में त्यागी तथा बिहार में भूमिहार कहा जाता है। पिता श्री विनायक राव डाक विभाग के कर्मचारी थे औ माता सौ. लक्ष्मीबाई एक धर्मनिश्ठ महिला। बाल्यावस्था बारामती में गुजरी। स्मरण षक्ति अति तीव्र होने के कारण छोटी आयु में ही करूणाश्टक, गीता, मनुस्मृति और महाभारत तथा रामायण के चयनित ष्लोक याद कर लिये थे। षांडिल्य गौत्र और ऋग्वेदाभ्यासी हाने के कारण वे वेदपाठ भी नियमित करते थे।

श्री गोडसे को पागल और अषिक्षित कहने वालों को यह ज्ञात होना चाहिये कि जिसके लिये वे अपमानजनक षटदावली प्रयोग कर रहे हैं वह एक प्रतिश्ठित पत्रकार, लेखक विचारक और कवि भी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल यात्रा की और निर्दयतापूर्वक पुलिस के अत्याचार सहे। गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोन से उनका कभी विरोध नहीं रहा। अपने प्रारंभिक जीवन में वे गांधीजी के सत्याग्रह में भी अग्रणी भूमिका में होते थे। एक कवि के रूप में उन्होंने देषप्रेम से ओत-प्रोत अनेक रचनायें लिखीं। महाराश्ट्र के गणपति समारोह में उनके द्वारा लिखित देषभक्ति के गीत गाये जाते थे। ‘लक्ष्मीतनय‘ नामक एक खंड काव्य लिखा और ‘राम‘ रक्षा स्तोत्र‘ को काव्यानुवाद भी किया।

वे ‘‘अग्रणी‘‘ समाचार पत्र के संपादक थे जो कुछ समय पष्चात ‘हिंदू राश्ट्र‘ के नाम से प्रकाषित होने लगा। उसका अंतिम अंक 31 जनवरी 1947 को प्रकाषित हुआ। उसके पष्चात सरकारी कू्ररता और गांधीवादी लोगों द्वारा चितपावन ब्राह्मणों के विरूद्ध फैलायी गयी व्यापक हिंसा के कारण बंद हो गया। उनके द्वारा लिखित संपादकीय, उनकी विवेचन क्षमता और तार्किकता को प्रकट करते हैं। अनेक भाशाओं पर उनका पूर्ण अधिकार था।

जब गांधी हत्या का मुकदमा (प्रकरण) चल रहा था तो भारत सरकार द्वारा उनके अल्प शिक्षित होने के कुछ प्रमाण प्रस्तुत किये गये थे। इन प्रमाणों और पं. नाथूराम गोडसे की उच्च बौद्धिक क्षमता पा टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा कि ‘‘उनका (गोडसे का) अध्ययन अत्यंत गंभीर है। इस न्यायालय में अपने पक्ष का प्रतिपादन करते समय उन्होंने अंग्रेजी भाशा पर अपने पर्याप्त अधिकार का और प्रषंसनीय सुस्पश्ट विचार क्षमता का परिचय दिया है।‘‘ (टंकित निर्णय पत्र पृश्ठ-206)

इस हत्या प्रकरण की न्यायपीठ में न्यायमूर्ति श्री खोसला, श्री भंडारी और श्री अच्छराम थे। न्यायमूर्ति श्री खोसला ने गांधी हत्या के पष्चात मुकदमे के संस्मरणों पर आधारित एक पुस्तक लिखी। अपनी पुस्तक में न्यायमूर्ति खोसला लिखते हैं कि ‘‘नाथूराम का बयान न्यायालय कक्ष में उपस्थित लोगों के लिये आकर्शण की वस्तु था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावुक हो जाता था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनाई देती थी। दर्षकों की आंखें गीली होती थी और आंसू गिरते दिखाई देते थे।

यदि इन दर्षकों को न्याय करने का कार्य सौंप दिया जाता तो यह निष्चित था कि वह नाथूराम गोडसे को निर्दोश करार दे देते।‘‘ ;इसका अर्थ यह है कि श्री गोडसे जो षब्द बोल रहे थे, वही षब्द उपस्थित दर्षकों के हृदय में पीड़ा बनकर पहले से ही उपस्थित थे। जब श्री गोडसे ने बोलना षुरू किया तो दर्षकों की पीड़ा आंसू बनकर बाहर आ गयी।
श्री गोडसे के आरोप – पं. नाथूराम गोडसे ने अपना निवेदन-प्रत्यावेदन 150 बिंदुओं में न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया। उसके लिये

उन्होंने किसी अधिवक्ता की सहायता नहीं ली। अपना स्पश्टीकरण वह स्वयं तैयार करते थे। यह निवेदन (प्रत्यावेदन) भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अभिलेख है जो यह सिद्ध करता है कि ‘‘पंथनिरपेक्षता‘‘ और अहिंसा‘‘ के थोथे नारे के पीछे का चेहरा कितना कू्रर और भयावह है।

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गांधी वध पर न्यायालय में दिये गये बयान के अंश

मैंने गांधी जी को राजनैतिक क्षेत्र से सदा के लिये हटाने का निश्चय किया। मैं जानता था कि वैयक्तिक स्तर पर मेरा सब कुछ नष्ट हो जायेगा। मैं धनी नहीं, मध्य वर्ग का हूं। मैं अपने प्रांत में सार्वजनिक कार्य करता था। मैंने लोगों की जोे सेेवा की उसके कारण मुझे अपने प्रांत में आदर और सम्मान मिला। सभ्यता और संस्कृति के संस्कारों से मैं पूरा परिचित था। मैं जो योजनाऐं बनाता उसे पूरा करने की पंक्ति मुझमें थी। मेरा शरीर  सबल है। न कोई अंग विकार है, न ही मुझे कोई व्यसन है। यद्यपि मैं विद्धान नहीं हूं परंतु विद्वानों के लिये मेरे हृदय में आदर है।

February 1948: The niece of Mahatma Gandhi (Mohandas Karamchand Gandhi) places flower petals on his brow as he lies in state at Birla House, New Delhi, after his assassination. Immediately after this picture was taken the procession left for the burning ghat on the banks of the river Jumna, where the cremation took place. (Photo by Keystone/Getty Images)

(Photo by Keystone/Getty Images)

सन् 1921-30 में कांग्रेस ने जब सहयोग आंदोलन षुरू किया तब मैंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। मैं तब विद्याार्थी था। इस आंदोलन संबंधित भाषण जो समाचार-पत्रों में छपे, मैंने पढ़े और मैं प्रभावित हुआ। मैंने आंदोलन में भाग लेने का विचार किया। कुछ समय बाद आंदोलन असफल हो गया तो मुसलमानों से संबंधित समस्याऐं बहुत जोर पकड़ गई।

फलस्वरूप हिंदू महासभा के नेता डॅा0 मुंजे, भाई परमानंद और मालवीय जी आदि हिंदू समाज के नेता हिंदुओं के संगठन में लग गये। सन् 1825 के लगभग स्वर्गीय डॅा0 हेडगेवार ने राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव डाली। उनके भाषणों का मुझ पर प्रभाव पड़ा। मैं स्वयंसेवक बना। मै महाराष्ट्र के उन युवकों में था, जिन्होंने संघ में उसके प्रारंभ से भाग लिया। कुछ वर्शों तक मैंने संघ में काम किया। कुछ दिन पष्चात् मैंने सोचा कि वैधानिक रूप से हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा के लिये राजनीति में भाग लेना चाहिये। जिस कारण मैं संघ को छोड़कर हिंदू महासभा में आ गया।

सन् 1935 में महासभा ने हैदराबाद में आंदोलन किसा तो मैं पहला जत्था लेकर आया। मुझे एक वर्श का कारावास मिला। मुझे हैदराबाद निजाम की बर्बरता और दानवता का व्यक्तिगत अनुभव है। वंदेमातरम् गाने पर वहां मुझे कई बार बेंते तक लगाई गयी थी।

सन् 1943 में बिहार सरकार ने आदेष दिया कि भागलपुर में हिंदू महासभा का अधिवेषन न हो। हिंदू महासभा ने उसका उल्लंघन करने का निष्चय किया, क्योंकि सरकार की यह आज्ञा अनुचित थी। सरकार के सब प्रतिरोंधों के बावजूद अधिवेषन हुआ। अधिवेषन की तैयारी करने के लिये मैं लगभब एक मास तक राश्ट्रविरोधी तुश्टीकरण के विरोध में भूमिगत होकर काम करता रहा। मैंने समाचार-पत्रों में अपने कार्य की प्रषंसा पढ़ी और देखा कि जनता ने उस समय मेरे सार्वजनिक कार्य को सराहा।

मेरी प्रकृति में हिंसा नहीं थी।बडगे ने जो कहा कि मैंने श्री भोपटकर को मारने को चाकू निकाला था, झूठ है। श्री भोपटकर हमारे पक्ष के वकील हैं। यदि मैं उन पर चाकु निकालता तो क्या वे हमारी सहायता कर सकते थे? यदि वह घटना सही होती तो मैं श्री भोपटकर की सहायता लेता भी नहीं। मेरे व्यक्तित्व से परिचित हैं, वे मेरी षांत प्रकृति को जानते हैं, किंतु उच्च नेताओं ने गांधीजी की सहमति से मातृभूमि के टुकड़े कर डाले तब मेरा हृदय क्षोभ से भर गया।

मैं स्पश्ट करना चाहता हूं कि मैं कांग्रेस का षत्रु नहीं। मैं इस संस्था को सबसे अधिक महत्व देता रहा, क्योंकि उसने देष की आजादी के लिये काम किया था। मेरा नेताओं से मतभेद था तथा अब तक है। यह मेरे 28 फरवरी 1935 के सावरकर के नाम पत्र से भली-भांति विदित होता है। आज भी मेरे वही विचार हैं।

गांधीजी से मेरी षत्रुता नहीं थी। लोग कहते हैं कि पाकिस्तान योजना में उनका मन षुद्ध था। मैं यह बताना चाहता हूं कि मेरे मन में देष प्रेम के अतिरिक्त कुछ न था। मुझे इस कारण हाथ उठाना पड़ा कि पाकिस्तान बनने पर जो भयंकर घटनायें हुई उनके उत्तरदायी केवल गांधीजी थे।
मुझे यह पता था कि हत्या के बाद लोगों के विचार मेरे विशय में बदल जायेंगे। समाज में जितना मेरा आदर है, वह नश्ट हो जायेगा। मैं जानता था कि समाचार-पत्र बुरी तरह मेरी निंदा करेंगे, किंतु मैं यह नहीं जानता था कि अखबार इतने पतित हो जायेंगे कि सत्य का गला घोंट देंगे। समाचार-पत्रों ने कभी निश्पक्षता से नहीं लिखा। यदि वे (गांधीजी) देष के हित का अधिक ध्यान रखते और एक मनुश्य की व्यक्तिगत इच्छाओं को कम ध्यान देते तो देष के नेता पाकिस्तान न स्वीकार न करते।

समाचार-पत्रों की यह नीति थी कि लीडरों की गलतियों को प्रकट न होने दिया जाय। देष का विभाजन इससे सरल हो गया। ऐसे भ्रश्ट समाचार-पत्रों के डर से मैंने अपने निष्चय की दृढ़ता को विचलित नहीं होने दिया। कुछ लोग कहते हैं कि यदि पाकिस्तान न बनता तो आजादी न मिलती। मैं इस विचार को ठीक नहीं मानता। लीडरों ने अपने पाप को छिपाने के लिये यह बहाना बनाया है। गांधीवादी कहते हैं कि उन्होंने अपनी पंक्ति से स्वराज्य पाया। यदि उन्होंने अपनी षक्ति से स्वराज्य लिया है तो ‘‘उन्होंने हारे हुए अंग्रेजों को पाकिस्तान की षर्त क्यों रखने दी और पंक्ति से क्यों न रोका?‘‘

मेरे विचार से महात्मा और उनके अनुयायियों की एक ही ‘पालिसी‘ रही, और वह यह कि पहले यवनों की मांगों पर विरोध दर्शाना, फिर हिचक दिखाना और अंत में आत्म-समर्पण कर देना। इसी प्रकार पाकिस्तान की रूपरेखा स्वीकार कर ली गई। जून 1947 को माउंटबैटन के साथ बैठकों में छलपूर्वक पाकिस्तान स्वीकार कर लिया गया। पंजाब, बंगाल, सीमाप्रांत और सिंध के हिंदुओं का कोई विचार नहीं किया गया। देष के टुकड़े करके एक मजहबी धर्म-निश्ठित मुस्लिम राज्य बना दिया गया। मुसलमानों को अपने अराश्ट्रीय कार्यों का फल (पुरस्कार) पाकिस्तान के रूप में मिल गया।

इसके विपरीत गांधीवादी नेताओं ने उन लोगों को देशद्रोही, सांप्रदायिक कहकर पुकारा जिन्होंने पाकिस्तान का विरोध किया था। (जबकि पाकिस्तान ने स्वयं स्वीकार करके जिन्नाह की सब बात ली थी)। इस दुर्घटना से मेरे मन की शान्ति भंग हो गयी। पाकिस्तान बनाने के बाद कांग्रेस सरकार पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा करती तो शायद मेरा क्रोध शांत हो जाता। मैं यह नहीं देख सका कि जनता को धोखा दिया जाये।

करोड़ों हिंदुओं को मुसलमानों की दया पर छोड़कर गांधीवादी कहते रहे कि हिंदुओं को पाकिस्तान से नहीं आना चाहिये और वहीं रहना चाहिये। इस प्रकार हिंदू मुसलमानों के चुंगल में फंस गये और विकट विपत्तियों के शिकार हुए। मुझे उन घटनाओं की यााद आती है तो मैं कांप उठता हूं।

प्रतिदिन सहस्त्रों हिंदुओं का संहार होता था। पंद्रह हजार सिखों को गोलियों से भून दिया गया। हिंदू स्त्रियों को नग्न करके जुलूस निकाले गये। उनको पषुओं की भांति बेचा गया। लाखों हिंदुओं को धर्म बचाकर भागना पड़ा। चालीस मील लंबा हिंदू-निराश्रितों का जत्था हिंदुस्तान की ओर आ रहा था। हिंदुस्तानी षासन इस भयानक कृत्य का कैसा भयानक निवारण करता था? – ‘‘उन निराश्रितों को वायुयान से रोटियां फेंककर?‘‘
भारत सरकार पाकिस्तान से अत्याचार रोकने के लिये अनुरोध करतीया धमकी देती कि यदि पाकिस्तान में अत्याचार बंद नहीं हुआ तो भारत में भी मुसलमानों की बुरी दषा होगी तो इतने अत्याचार न होते।

भारत सरकार गांधीजी के इषारों पर चलती थी परंतु उसकी नीति कुछ और ही थी। यदि पाकिस्तान के हिंदुओं की रक्षा के लिये यदि समाचार पत्र कुछ लिख देते थे यह अर्थ लिया जाता था कि वे हिंदू मुसलमानों में मतभेद फैलाने का प्रयत्न कर रहे हैं। ऐसे कार्यों को अपराध माना जाने लगा और प्रेस इमरजेंसी एक्ट की धारायें लागू करके एक के बाद दूसरी जमानत मांगी जाने लगी। मुझे भी अनके नोटिस मिले और 16,000 रूपये की सुरक्षित निधि तक मांगी गयी। श्री मोरारजी देसाई के न्यायालय बयान के अनुसार ऐसी 900 घटनाऐं हुई। इतना ही नहीं, जब प्रेस प्रतिनिधि मंडल मोरार जी से मिलने गया तो उन्होंने उनकी एक न सुनी।

इस प्रकार मुझे आषा न रही कि गांधीवादी कांग्रेस सरकार पर षांतिमय सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुसलमानों से संबंध रखने वाले रखने वाली समस्याओं में गांधीजी ने कभी जनता के विचारों पर ध्यान नहीं दिया। गांधीजी की अहिंसा की आड़ में इतना रक्तपात हो चुहा था कि जनता पाकिस्तान के पक्ष के किसी भी विचार का स्वागत करने के लिये तैयार न थी।स्पश्ट था कि जब तक पाकिस्तान में धर्मांध मुस्लिम राज्य है तब तक भारत में षांति नहीं हो सकती। फिर भी गांधीजी इस प्रकार का प्रचार कर रहे थे और इस तरह के विचार पाकिस्तान के पक्ष में फैला रहे थे जैसा कर पाने में कोई कट्अर लीगी नेता भी सफल न हो पाता। इन्हीं दिनों आमरण अनषन की घोशणा करते हुए जो षर्तें थी वह भी केवल हिंदुओं के विरूद्ध और मुसलमानों के पक्ष में थी । गांधीजी के अनषन की जो षर्तें थीं उनमें पहली यह थी कि दिल्ली की खाली पड़ी मस्जिदों में रह रहे हिंदू षरणार्थियों को बाहर निकाला जाये और मस्जिदें मुसलमानों को सौंप दी जाये। गांधीजी ने अपनी षर्त सरकार और अन्य नेताओं को अनषन की धमकी देकर स्वीकार कराई। कजस दिन यह घटना हुई उस दिन मैं दिल्ली में था। मैंने देख कि किस प्रकार गांधीजी की जिद को पूरा किया गया। वे षीत के दिन थे। गांधीजी ने अनषन खोला उस दिन वर्शा हो रही थी। ऐसी असाधारण सर्दी और वर्शा में अच्छे स्थानों पर रहने वाले लोग भी कांप रहे थे। उस समय निराश्रित षरणार्थियों के कुटुंब के कुटुंब मस्जिदों से सर्दी के मारे कांपते हुए निकल गये उनकी रक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया गया। कुछ षरणार्थियों जो कुटंुब और स्त्रियों सहित बिरला हाउस गये और उन्होंने नारे लगाये-‘‘गांधीजी हमें स्थान दो।‘‘ उस भव्य भवन में रहने वाले गांधी तक उन निराश्रितों की आवाज नहीं पहुंच सकी। मैंने यह दृष्य अपनी आंखों से देखा जिसे देखकर कठोर से कठोर व्यक्ति का हृदय भी पिघल जाता।

मेंरे मस्तिश्क में इससे अनेक विचार आने लगे। मैंने सोचा कि क्या षरणार्थियों ने प्रसन्नता से इन मस्जिदों में डेरे डाले हैं? नहीं-नहीं ! गांधी को भी उन स्थितियों का पुरा पता था, जिनसे बाध्य होकर उन्हें अपने घर छोड़कर इन मस्जिदों की षरण लेनी पड़ीं। पाकिस्तान में एक भी मंदिर या गुरूद्वारा सुरक्षित नहीं रहा। षरणार्थियों ने अपनी आंखों से देखा था कि किस प्रकार मुसलमानों ने हिंदू मंदिरों और गुरूद्वारों को अपवित्र किया। जो हिंदू षरणार्थी दिल्ली षरण लेने के लिये आये थे उन्हें यहां कोई स्थान नहीं मिला। इसमें आष्चर्य की क्या बात है यदि उन लोगों ने पेड़ों के नीचे और गली-कूूचों में न पड़े रह कर, पंजाब में बीती हुई दुर्घटनाओं को स्मरण करके, दिल्ली की व्यर्थ खाली पड़ी मस्जिदों में षरण ली। मेरे विचार मंे इस प्रकार मस्जिदें मानवता की भलाई के लिये काम आ रही थी। गांधीजी ने यह निष्चय किया कि मंस्जिदों को खाली कराया जाये, परंतु उन षरणार्थियों के रहने का दूसरा प्रबंध क्यों नहीं कराया ? उन्होंने पाकिस्तान के मंदिर हिंदुओं को सौंपने की मांग क्यों नहीं की ? जिससे पता चलमा है कि गांधी वास्तव में अहिंसा के पुजारी हैं, हिंदू मुस्लिम एकता के इच्छुक हैं और उनमें निश्पक्ष आत्मषक्ति है।

गांधी ने पूरी चालाकी की और अपने अनषन को खोलने के लिये पाकिस्तान के लिये एक शर्त भी न रखी। यदि वे रखते तो संसार देखता कि गांधीजी बनषन करते हुए स्वर्ग सिधार जातें और पाकिस्तान के एक भी मुसलमान को लेषमात्र दुःख न होता। उन्होंने अपने अनुभव से देख लिया था कि व्रत का जिन्नाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और मुस्लिम लीग उनकी आत्मषक्ति की परवाह नहीं करती।

अंत में यह कहना अनुचित न हो कि गांधी के फूल (अस्थि) भारत और विदेषों की बहुत सी नदियों में बहाये गये परंतु यह अस्थि पाकिस्तान की सिंधु नदी में नहीं बहायी जा सकी। इस संबंध में पाकिस्तान में भारत के राजदूत श्रीयुत श्रीप्रकाष जी का प्रयत्न निश्फल रहा।
अब 55 करोड़ रूपयों की बात लीजिये। उप-प्रधानमंत्री का निवेदन देखिये। गांधीजी ने स्वयं कहा है कि किसी सरकार से उसका निर्णय बदलवाना कठिन होता है। लेकिन भारत सरकार नें गांधीजी के अनषन के कारण पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये न देने का अपना निर्णय बदल दिया।

सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये न देने का निर्णय जनता के प्रतिनिधि होने के नाते किया था, लेकिन गांधीजी के अनषन ने इस निर्णय को बदल दिया। तब मुझे यह ज्ञात हुआ कि गांधीजी की पाकिस्तान परस्ती के आगे जनता के मत का कोई महत्व नहीं है। (अपने प्रतिवृत्त के पहले खंड के पृश्ठ 143 पर न्या. कपूर ने उस समय वृत्त-पत्रों में छपी प्रक्रिया का एक उदाहरण दिया है। अनुच्छेद 12/ए-45 जो इस प्रकार है)

क्रमश:

 

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