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नाथूराम गोडसे – स्वतंत्र भारत का पहला और अंतिम बलिदानी

अकारण या सकारण की गयी हिंसा को उस समय की परिस्थियों के अस्थायी भाव का दुष्परिणाम कहा जा सकता है। लेकिन गांधी हत्या विक्षिप्तता की स्थिति नहीं थी, अपितु दो विपरीत वैचारिकी और कार्यशैली के मध्य, संघर्ष का परिणाम थी।

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पं. नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की, इसका समर्थन हम नहीं कर रहे हैं। हिंसा कैसी भी हो, त्याज्य, और घृणित होती है, वह ईश्वर के प्रति अपराध है। गांधीजी के कार्यों और व्यक्तित्व को लेकर असहमति हो सकती है लेकिन उनके अर्थशास्त्र और ग्रामोत्थान दर्शन का हम आदर करते हैं क्योंकि वह वैदिक अर्थव्यवस्था का आधार है।

वर्तमान में देष को वही अर्थतंत्र चाहिये जहां प्रत्येक ग्राम स्वावलंबी और समृद्ध हो, पं. नाथूराम गोडसे ने भी गांधीजी के अर्थशास्त्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विरोध नहीं किया था। हिंसा के कारण वे थे जो भविश्य में गांधीजी द्वारा प्रतिपादित और प्रसारित नीतियों के कारण समाज के मार्ग में बाधक हो सकते थे।

हिंसात्मक समाज के प्रति कोमल भावना का समर्पण-अहिंसा के महान आदर्षों की श्रेणी में नहीं आता, यही दृश्टिकोण पं. नाथूराम गोडसे का भी था। व्यवहारिक और वैवारिक जीवन में गांधीजी और अहिंसा की जिस प्रकार व्याख्या करते थे, उस व्याख्या पर गोडसे को आपत्ति थी अन्यथा वैचारिक दृश्टि से गोडसे भी अहिंसावादी थे, ऐसा उनके पत्रों और विभिन्न वक्तव्यों से पता चलता है।

हमारे साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम केवल कृत्य को देखते हैं कृत्य करने वाले के भाव को नहीं देखते। यह ठीक है कि गोडसे द्वारा की गयी हिंसा गलत थी लेकिन देशभक्ति के महान भावों से अभिभूत होकर उसने ऐसा कार्य किया, जिसमें उनका जीवन भी दांव पर था, जो वंदनीय है।उस पर भी ध्यान देना आवष्यक है। यह न्याय संगत समाज कर्तव्य है।

पं. नाथूराम गोडसे ने न्यायालय में कहा था कि ‘‘यदि देषभक्ति पाप है तो मैं मानता हूं कि मैंने पाप किया है। मुझे विश्वास है कि मनुष्यों द्वारा न्यायालय के उपर कोई न्यायालय हो तो उसमें मेरे काम को अपराध नहीं समझा जायेगा।‘‘ पं. नाथूराम गोडसे यह जानते थे कि गांधी वध के पश्चात लोग उन्हें पागल या सिरफिरा जैसे विश्लेषणों से संबोधित करेंगे। इसीलिये उन्होंने न्यायालय में निवेदन किया कि लोग मुझे विक्षिप्त व्यक्ति की संज्ञा देंगे, कहीं न्यायालय मुझे विक्षिप्त या मानसिक विकृति का षिकार न माने ले, और मुझ पर अपनी दया लादने का प्रयास करे या बचाव पक्ष ही मुझे मनोविकार ग्रस्त घोषित कर दया की याचना करे। अतः मैं नहीं चाहता कि दया की ऐसी स्थिति किसी प्रकार भी उत्पन्न हो। (गांधी वध और मैं-गोपाल गोडसे पृ.-34)

श्री गोडसे ने स्वस्थ मन और मष्तिष्क से गांधीजी की हत्या की। हत्या के समय भी वे तनावग्रस्त नहीं थे। 30 जनवरी 1948 की सायं बिड़ला भवन में उन्होंने 5ः17 पर गोली मारी। उनको भागने का पर्याप्त अवसर था, लेकिन वे नहीं भागे। जब उनसे पूछा गया कि गांधी हत्या के बाद उसके पास काफी समय था भागने का तो फिर वे क्यों नहीं भागे ? इस पर पं. नाथूराम गोडसे का कहना था कि यदि मैं भाग जाता तो यह बताने वाला कौन होता कि हत्या क्यों की गयी है ? निष्चित तौर पर उन्होंने न्यायालय में दिये गये बयान के 150 बिंदुओं में गांधी हत्या की स्वीकृति की है। गांधी हत्या के जो कारण उन्होंने बताये हैं वे अत्यंत तार्किक और अकाट्य हैं। पूर वाद (मुकदमे) में भारत सरकार की ओर से उन आरोपों का स्पश्टीकरण नहीं दिया गया और आज तक पं. नाथूराम गोडसे द्वारा उठाये गये बिंदुओं पर किसी भी गांधीववदी ने नहीं कहा कि आरोप गलत है। असल में, पं. नाथूराम गोडसे का हिंसात्मक कृत्य एक संवेदनषील और विवष भारतीय की पीढ़ा है वह यह समझने लगे थे कि गांधीजी बार-बार अनषन करते हैं और अपनी उचित-अनंचित मांगों को मनवा लेते हैं। गोडसे इसे गांधीजी द्वारा अनषन तोड़ने के बदले फिरौती मानते थे।

पं. नाथूराम गोडसे : बहुमुखी प्रतिभा के धनी – पं. नाथूराम गोडसे का जन्म 19 मई 1910 में महाराश्ट्र के चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। चितपावन ब्राह्मण समाज वही होता है जिसे पष्चिमी उत्तर प्रदेष और हरियाण में त्यागी तथा बिहार में भूमिहार कहा जाता है। पिता श्री विनायक राव डाक विभाग के कर्मचारी थे औ माता सौ. लक्ष्मीबाई एक धर्मनिश्ठ महिला। बाल्यावस्था बारामती में गुजरी। स्मरण षक्ति अति तीव्र होने के कारण छोटी आयु में ही करूणाश्टक, गीता, मनुस्मृति और महाभारत तथा रामायण के चयनित ष्लोक याद कर लिये थे। षांडिल्य गौत्र और ऋग्वेदाभ्यासी हाने के कारण वे वेदपाठ भी नियमित करते थे।

श्री गोडसे को पागल और अषिक्षित कहने वालों को यह ज्ञात होना चाहिये कि जिसके लिये वे अपमानजनक षटदावली प्रयोग कर रहे हैं वह एक प्रतिश्ठित पत्रकार, लेखक विचारक और कवि भी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल यात्रा की और निर्दयतापूर्वक पुलिस के अत्याचार सहे। गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोन से उनका कभी विरोध नहीं रहा। अपने प्रारंभिक जीवन में वे गांधीजी के सत्याग्रह में भी अग्रणी भूमिका में होते थे। एक कवि के रूप में उन्होंने देषप्रेम से ओत-प्रोत अनेक रचनायें लिखीं। महाराश्ट्र के गणपति समारोह में उनके द्वारा लिखित देषभक्ति के गीत गाये जाते थे। ‘लक्ष्मीतनय‘ नामक एक खंड काव्य लिखा और ‘राम‘ रक्षा स्तोत्र‘ को काव्यानुवाद भी किया।

वे ‘‘अग्रणी‘‘ समाचार पत्र के संपादक थे जो कुछ समय पष्चात ‘हिंदू राश्ट्र‘ के नाम से प्रकाषित होने लगा। उसका अंतिम अंक 31 जनवरी 1947 को प्रकाषित हुआ। उसके पष्चात सरकारी कू्ररता और गांधीवादी लोगों द्वारा चितपावन ब्राह्मणों के विरूद्ध फैलायी गयी व्यापक हिंसा के कारण बंद हो गया। उनके द्वारा लिखित संपादकीय, उनकी विवेचन क्षमता और तार्किकता को प्रकट करते हैं। अनेक भाशाओं पर उनका पूर्ण अधिकार था।

जब गांधी हत्या का मुकदमा (प्रकरण) चल रहा था तो भारत सरकार द्वारा उनके अल्प शिक्षित होने के कुछ प्रमाण प्रस्तुत किये गये थे। इन प्रमाणों और पं. नाथूराम गोडसे की उच्च बौद्धिक क्षमता पा टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति ने अपने निर्णय में लिखा कि ‘‘उनका (गोडसे का) अध्ययन अत्यंत गंभीर है। इस न्यायालय में अपने पक्ष का प्रतिपादन करते समय उन्होंने अंग्रेजी भाशा पर अपने पर्याप्त अधिकार का और प्रषंसनीय सुस्पश्ट विचार क्षमता का परिचय दिया है।‘‘ (टंकित निर्णय पत्र पृश्ठ-206)

इस हत्या प्रकरण की न्यायपीठ में न्यायमूर्ति श्री खोसला, श्री भंडारी और श्री अच्छराम थे। न्यायमूर्ति श्री खोसला ने गांधी हत्या के पष्चात मुकदमे के संस्मरणों पर आधारित एक पुस्तक लिखी। अपनी पुस्तक में न्यायमूर्ति खोसला लिखते हैं कि ‘‘नाथूराम का बयान न्यायालय कक्ष में उपस्थित लोगों के लिये आकर्शण की वस्तु था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावुक हो जाता था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनाई देती थी। दर्षकों की आंखें गीली होती थी और आंसू गिरते दिखाई देते थे।

यदि इन दर्षकों को न्याय करने का कार्य सौंप दिया जाता तो यह निष्चित था कि वह नाथूराम गोडसे को निर्दोश करार दे देते।‘‘ ;इसका अर्थ यह है कि श्री गोडसे जो षब्द बोल रहे थे, वही षब्द उपस्थित दर्षकों के हृदय में पीड़ा बनकर पहले से ही उपस्थित थे। जब श्री गोडसे ने बोलना षुरू किया तो दर्षकों की पीड़ा आंसू बनकर बाहर आ गयी।
श्री गोडसे के आरोप – पं. नाथूराम गोडसे ने अपना निवेदन-प्रत्यावेदन 150 बिंदुओं में न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया। उसके लिये

उन्होंने किसी अधिवक्ता की सहायता नहीं ली। अपना स्पश्टीकरण वह स्वयं तैयार करते थे। यह निवेदन (प्रत्यावेदन) भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अभिलेख है जो यह सिद्ध करता है कि ‘‘पंथनिरपेक्षता‘‘ और अहिंसा‘‘ के थोथे नारे के पीछे का चेहरा कितना कू्रर और भयावह है।

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